एक मासूम सी लड़की,
एक नदी को डांटती है,
ऐ नदी, तू क्यों बहने लगी-
गांव के ठीक बगल से-
कुछ दिनों पहले।
एक नदी पहले से है-
दूसरी तरफ हमारे गांव के
।तू गहरी, निर्मल है तो क्या-
मैं नहीं खेलूंगी तेरे साथ,
क्यों बांटू अपना सुख-दु:ख मैं-
एक अजनबी के साथ?
तू तो बिल्कुल नयी है,
क्यों हक जताऊं मैं तुझ पर।
तू हट जा मेरे गांव से-
बहुत दूरजहां से आवाज़ न आए-
तेरे कलकल कलकल बहने की।
नहीं बन सकती मैं-
तेरी दोस्त कभी शायद।
बेचारी नदी अपना कसूर खोजती है,
रोती है ये सुनकर-
पर लौटे तो कैसे लौटे?
आंसू कहीं गुम हो जाते हैं,
और बहती रहती है वो-
तलाश में एक सच्चे दोस्त की।
Thursday, October 28, 2010
Saturday, September 27, 2008
आख़िर हाई एलर्ट का क्या मतलब ?

'हाई एलर्ट'!!! ये शब्द अब बहुत कॉमन लगता है ..जिस तरह से आतंकवादी अपनी साजिशों में दिन प्रतिदिन कामयाब होते जा रहे हैं उससे तो महज यही लगता है की ये किसी मुसीबत से आगाह करने या किसी संकट से लोहा लेने का शब्द नहीं बल्कि उन नौकरशाहों और राजतंत्र के कारिंदों का जुमला है जिन्हें ख़ुद के जिम्मदारियों का एहसास दिलाया जाना भी नागवार गुजरता है. वो ख़ुद तो बहुत ही हाई पोजीशन पर, बड़े बड़े हथकंडे हैं उनके पास, लेकिन किसी भी संकट की घड़ी में वो कुछ नहीं कर पाते हैं सिवाय हाई एलर्ट घोषित करने के। उन्हें नीचे नहीं दिखता न नीचा सुनाई देता है। वो ऊँचा सुनते हैं। और अगर कोई उनके काम करने के तौर तरीकों पर ऊँगली उठाये तो उसे बस कुछ खरी खोटी सुनाकर या अपनी मजबूरियों का पुलिंदा दिखाकर हकीकत से पल्ला झाड़ लेते हैं। कुछ नहीं कर पाती अपने देश की वो खुफियातंत्र और पुलिस, जिनसे देश के लोगों की सुरक्षा की डोर बंधी होती है। वो भी आम जनता की तरह तमाशबीन बने रहते हैं। और इस बात का इंतज़ार करते रहते हैं की कब मामला ठंढा हो और जान छूटे मुसीबतों से। हाई एलर्ट के नाम पर बस इतना ही होते है की कुछ बड़े शहरों के बड़े नुक्कडों पर पुलिसबल को तैनात कर दिया जाता है और कुछ लोगों की तलाशी ले ली जाती है। हो सकता है की लोगों को कभी कभार अपनी गलियों में पुलिस की गाड़ियों के सायरन की आवाज़ सुनाई दे जाए। लेकिन ये हकीकत नहीं है, न ही इससे ये समझ लेना जायज होगा की लोकतंत्र के इन तथाकथित नुमाइंदों को आपकी हिफाजत की कोई फिक्र है। इनको बस अपनी फिक्र होती है। लोगों के खून पसीने से जमा होने वाले सरकारी खजाने से मिलने वाली तनख्वाह की रोटी खाकर इनका जिगर इतना सख्त हो गया है की किसी भी धमाके से नहीं दहलता। चौराहों, नुक्कडों पे खड़े ये पुलिसवाले कुत्तों की माफिक ललचाई नज़रों से लोगों से निहारते रहते हैं, ये तलाशी लेते हैं तो जेबों की, और नहीं तो और कानून, नैतिकता, इमानदारी को गिरवी रखकर किसी के सामने चंद नोटों या सिक्को की खातिर हाथ पसारने में इन्हे बिल्कुल शर्म नहीं आती। इन्हे मेहनत के बदले मिलने वाली तनख्वाह को पाकर न तो खुशी होती है न ही ये उसे अपनी असल तनख्वाह मानते हैं, जब तक दिन भर में घूस के जरिये सौ-सौ के कुछ नोट इनकी जेब में नहीं आ जाते हैं तब तक इनके आत्मा को चैन नहीं मिलती है.
तो क्या ऐसे में क्या इन सरकारी सिक्यूरिटी गार्डों से ये अपेक्षा रखना वाजिब है की ये लोगों को सुरक्षा मुहैया करा पाएंगे? शायद नहीं! इसलिए ज़रूरी है की पहले इस सिस्टम को दुरुस्त किया जाए..उसके बाद दहशतगर्दों को पकड़ने की कवायद तेज की जाए। क्यूँकी आधा समस्या अपना तंत्र है, जिसकी खामियों को अगर सुधार लिया जाए तो शायद हमें उतनी हायतौबा न करना पड़े। नहीं तो इनके पास जुमले तो हैं ही रटने के लिए..और आपको गुमराह करने के लिए। ये हमेशा ये कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहेंगे की," हम सबको सुरक्षा नहीं मुहैया नहीं करा सकते"। लेकिन हमारा इतना अधिकार तो बनता ही है हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था एक ऐसे माहौल बनाये जिसमे हम खुद को महफूज महसूस कर सकें.
तो क्या ऐसे में क्या इन सरकारी सिक्यूरिटी गार्डों से ये अपेक्षा रखना वाजिब है की ये लोगों को सुरक्षा मुहैया करा पाएंगे? शायद नहीं! इसलिए ज़रूरी है की पहले इस सिस्टम को दुरुस्त किया जाए..उसके बाद दहशतगर्दों को पकड़ने की कवायद तेज की जाए। क्यूँकी आधा समस्या अपना तंत्र है, जिसकी खामियों को अगर सुधार लिया जाए तो शायद हमें उतनी हायतौबा न करना पड़े। नहीं तो इनके पास जुमले तो हैं ही रटने के लिए..और आपको गुमराह करने के लिए। ये हमेशा ये कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ते रहेंगे की," हम सबको सुरक्षा नहीं मुहैया नहीं करा सकते"। लेकिन हमारा इतना अधिकार तो बनता ही है हमारे देश की सुरक्षा व्यवस्था एक ऐसे माहौल बनाये जिसमे हम खुद को महफूज महसूस कर सकें.
Friday, July 4, 2008
संवेदनाओं के मकड़जाल
रोज मेरे हाँथ में होता है,
एक कोरा काग़ज़-
जिसपर बनाने की कोशिश करता हूँ,
मैं कोई आकृति.
जिसमे दिखूं मैं, मेरी सोच.
खीचता हूँ, ढेर सारी रेखाएं
कुछ सीधी, कुछ लंबी-
कुछ संवेदनाओं के मकड़जाल की तरह
उलझी हुई,
एक में गुत्थम-गुत्था-
रंग भी भरता हूँ,
हर तरह के-
हर एक प्रतीकों के
रंग सोच के रंग,मंथन के रंग,
झुझलाहट के रंग-
फ़िर अंत में देखता हूँ
ऐसी तस्वीर
जिसमें कुछ नहीं दिखता,
कुछ समझ में नहीं आता.
न उन आड़ी तिरछी रेखाओं का महत्व
न ही उनका मतलब,
रंग भी कुछ नहीं कह पाते
सुन्न हो जाते हैं, बिल्कुल निशब्द
एक सन्नाटा पसर जाता है
कुछ टूट जाता है अचानक
वक्त दहाडें मारते हुए गुजर जाता है
ट्रेन की तरह, धड धड धड
कुछ अनसुना रह जाता है-
एक निर्जन पुल की कराह की तरह
एक कोरा काग़ज़-
जिसपर बनाने की कोशिश करता हूँ,
मैं कोई आकृति.
जिसमे दिखूं मैं, मेरी सोच.
खीचता हूँ, ढेर सारी रेखाएं
कुछ सीधी, कुछ लंबी-
कुछ संवेदनाओं के मकड़जाल की तरह
उलझी हुई,
एक में गुत्थम-गुत्था-
रंग भी भरता हूँ,
हर तरह के-
हर एक प्रतीकों के
रंग सोच के रंग,मंथन के रंग,
झुझलाहट के रंग-
फ़िर अंत में देखता हूँ
ऐसी तस्वीर
जिसमें कुछ नहीं दिखता,
कुछ समझ में नहीं आता.
न उन आड़ी तिरछी रेखाओं का महत्व
न ही उनका मतलब,
रंग भी कुछ नहीं कह पाते
सुन्न हो जाते हैं, बिल्कुल निशब्द
एक सन्नाटा पसर जाता है
कुछ टूट जाता है अचानक
वक्त दहाडें मारते हुए गुजर जाता है
ट्रेन की तरह, धड धड धड
कुछ अनसुना रह जाता है-
एक निर्जन पुल की कराह की तरह
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